इस्लाम में सबसे भरोसेमंद रूहानी हिफ़ाज़त कोई तावीज़ नहीं। यह एक मुख़्तसर, मुक़र्रर वज़ीफ़ा है जो दिन में दो बार, हर रोज़ पढ़ा जाए।
क़ुरआन व सुन्नत से रूहानी इलाज
रुक़्या क्या है
रुक़्या यह है कि बीमार या मुब्तला शख़्स पर पढ़ कर अल्लाह से शिफ़ा माँगी जाए। नबी ﷺ ने ख़ुद किया, इजाज़त दी, और आप ﷺ पर किया भी गया। उलमा ने तीन शर्तें बयान की हैं: अल्फ़ाज़ अल्लाह के कलाम, उसके नामों या मसनून दुआओं के हों; ज़बान ऐसी हो जिसका मअना मालूम हो; और पढ़ने वाला यह अक़ीदा रखे कि शिफ़ा सिर्फ़ अल्लाह से है, अल्फ़ाज़ से नहीं।
मामूल की तिलावत
- सूरह अल-फ़ातिहा।
- आयतुल कुर्सी (अल-बक़रा 2:255)।
- सूरह अल-बक़रा की आख़िरी दो आयतें।
- सूरह अल-इख़्लास, अल-फ़लक़ और अन-नास — तीन-तीन बार, हथेलियों पर दम कर के पूरे बदन पर फेर लें।
मसनून दुआ
اللّٰهُمَّ رَبَّ النَّاسِ، أَذْهِبِ الْبَأْسَ، اشْفِ أَنْتَ الشَّافِي، لَا شِفَاءَ إِلَّا شِفَاؤُكَ، شِفَاءً لَا يُغَادِرُ سَقَمًاसहीह बुख़ारी 5743
ऐ अल्लाह! लोगों के रब! तकलीफ़ दूर फ़रमा, शिफ़ा दे — तू ही शिफ़ा देने वाला है, तेरी शिफ़ा के सिवा कोई शिफ़ा नहीं — ऐसी शिफ़ा जो कोई बीमारी बाक़ी न छोड़े।
जो जायज़ नहीं
- ऐसे तावीज़ जिनमें क़ुरआन, अस्माए इलाही या मसनून दुआओं के अलावा कुछ हो।
- ऐसा अमल जिसमें बीमार से कोई नाजायज़ काम कराया जाए, नमाज़ छुड़ाई जाए, या नतीजे की ज़मानत पर फ़ीस ली जाए।
- ग़ैब का दावा — कि जादू किसने किया और कहाँ दबा है। यह काहिनी है, और इस पर हदीस बहुत सख़्त है।
दवा के साथ, दवा की जगह नहीं
अल्लाह के बंदो! इलाज कराओ — अल्लाह ने कोई बीमारी ऐसी नहीं उतारी जिसकी दवा न उतारी हो।
रुक़्या डॉक्टर का बदल नहीं। बीमार का इलाज होना चाहिए, और तिलावत उस इलाज के साथ चलती है। जो कोई बीमार से दवा छुड़ाए, वह उसका नुक़सान कर रहा है, चाहे कुछ भी पढ़ता हो।
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